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साहिल कौशर

क्या बेटियो के लिए सुरक्षित है हमारा समाज ?

 अलीगढ़ की घटना ने एक फिर देश को झकझोर कर रख दिया है हालांकि  इस प्रकार की घटना पहली बार नही हुई है  पिछले कुछ वर्षों में ऐसे जघन्य अपराधों की घटनाओं में इजाफा हुआ है। जब भी ऐसी कोई घटनाएं होती है तो देशवासी आहत होते हैं और अपने गुस्से का इज़हार करते है | हर बार की तरह इस बार भी अपराधियों को फाँसी की सज़ा दिलाने के लिए लोग अपनी आवाज बुलंद कर रहे है। लेकिन इन सब के बीच कुछ सवाल ऐसा है जो हर बार छूट जाते  है, क्या हमारे समाज मे हमारी बच्चिया सुरक्षित है ?

 क्या सोशल मीडिया पे अपना गुस्सा जाहिर कर देने से या कैंडल मार्च कर देने से समाज मे बदलाव आ रहा है ? अगर ये सब कर लेने भर से ही हमारी बच्चिया   महफूज हो जाती तो ऐसी घंटनाये फिर से क्यो हो रही ह और हमलोग बार बार शर्मिंदा क्यो होते जा रहे है। आज हमें मंथन करने की जरूरत है कि हम कैसा समाज बना रहे हैं जहाँ हमारे बच्चे भी सुरक्षित नही हैं। 
 
ऐसे जघन्य घटनाओं के लिए जितनी जिम्मेदार पुलिस प्रसासन है उतने ही जिम्मेदार हमलोग है क्योंकि कही न कही हमलोग अलग अलग समुदाय में बटे हुए है और ऐसे संवेदनशील मुद्दे पे भी हम अलग अलग राय रखते है। कभी कभी तो अपराधियों की धर्म या समुदाय को देख कर इसकी आलोचना करते है और कुछ लोग इसकी राजनीतिक माइलेज लेने की भी कोशिश करते है। क्या ऐसा करने से अपराधों में कमी आरही हैं? नही! बिल्कुल नही इससे तो अपराधियों के हौसले और भी बुलंद हो रहे है और अपराधों में निरंतर बदोतरी होती रही है। किसी भी अपराध में धर्म का एंगल देखना हमारे समाज के लिए शर्मनाक हैं।
 
अगर हमलोग एक हो जाए और साथ लड़े तो उम्मीद है कि बच्चों को सुरक्षित माहौल दे सकेंगे।
हमे समाज मे ज्यादा से ज्यादा जागरूकता लाने की जरूरत है। कही न कही हमारी सरकारें या पुलिस प्रसासन नाकाम साबित हो रही है और ये आम जनता की जिम्मेदारी है कि सरकार पे दबाव बनाए ताकि प्रसासन कोई ठोस और कठोर फैसले ले जिससे हमारा समाज हमारे बच्चों के लिए सुरक्षित हो सके।

लेखक: साहिल कौशर
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