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सन्नी राज

पाकिस्तान में विखण्डन:क्या आतंकवाद के समाधान का विकल्प?

          आतंकवाद आधुनिक दौर मे मानव विध्वंस की सबसे बडी समस्या बनकर उभरा है। इसने विश्व के कितने ही देशों को अपनी गिरफ्त में लिया है। अमेरिका का वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, टाइम स्क्वायर, पेरिस का कार बम धमाका, भारत मे संसद पर हमला तथा सीरिया मे आंतकी घटनाएं प्रमुख रूप से शामिल की जा सकती हैं। विश्व मे हर वर्ष सैकडों से अधिक आतंकवादी घटनाएं होती हैं, जिनमें हजारों की तादात में लोग काल के ग्रास बन जाते हैं तथा इसके साथ ही निजी व सार्वजनिक सम्पत्ति की हानि भी होती है।
 
विश्व के अधिकतर देशों मे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आतंकवादी घटनाएं होती रहती है। भारत आतंकवाद से प्रभावित होने वाला विश्व का सबसे बडा देश है, जो पिछले 70 वर्षों से आतंकवाद का सामना कर रहा है। भारत मे आतंकवाद की समस्या का मुख्य कारण भारत-पाक के बीच कश्मीर विवाद है।भारत की आजादी के पश्चात राज्यो के एकीकरण के समय कश्मीर के राजा के द्वारा विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के पश्चात कश्मीर भारत का राज्य बन गया तथा कुछ भाग पाक मे चला गया, जिसे पाक अधिकृत कश्मीर के नाम से जाना जाता है। कश्मीर का भारत मे मिलना, पाक को नागवार लगा और पाक ने 1949 मे पहली आंतकी घटना को कश्मीर मे अंजाम दिया जिसका प्रमुख उदेश्यकश्मीर को पाक मे शामिल कराना था।कश्मीर मे पाकिस्तान द्वारा प्रयोजित इस हमले के बाद दोनों देशो में विवाद इतना बढ़ गया कि भारत वैश्विक संगठनों के द्वारा मध्यस्तता के माध्यम से इसके स्थायी समाधान हेतु इसे यूएनओ मे ले जाया गया परन्तु वैश्विक समुदायो ने दक्षिण एशिया मे अपना प्रभुत्व स्थापित करने के उदेश्य से इसको सुलझाने का कभी भी ईमानदार प्रयास नही किया।
 
1949 के बाद भारत मे आंतकवादी घटनाओं की बारम्बारता दिखने लगी, इसी संदर्भ मे भारत ने पाक से 1965 व 1971 में दो प्रत्यक्ष तथा 1999 मे कश्मीर के कारगिल मे एक अप्रत्यक्ष युद्ध लड़ा। इन युद्धो का बड़ा कारण पाकिस्तान द्वारा भारत मे प्रायोजित आतंकवाद था। इन युद्धों के बाद भी भारत में 2001 मे संसद पर हमला, 2006 अक्षरधाम मंदिर पर हमला, 2008 मे मुंबई के नरीमन हाऊस पर हमला, 2016 मे उडी व प्रतिवर्ष अमरनाथ यात्रियों पर हमला होता रहा। कश्मीर में होने वाली आतंकी घटनाएं तो अलग ही हैं। अभी हाल ही में फरवरी2019 में पुलवामा मे सीआरपीएफ़ के काफिले पर फिदायिनी हमले में भारत सहित सम्पूर्ण विश्व को आतंकवाद के विरूद्ध एकजुट कर दिया।
 
इन आतंकी घटनाओं को अंजाम देने वाले आतंकी संगठनों में जैश-ए-मोहम्मद, हिज्बुल मुजाहिद्दीन, अलकायदा, आईएसआईएस, जमात-उल-दावा व जैश-उल-उदल प्रमुख हैं, जो भारत ही नहीं वरन् विश्व की अस्मिता पर चोट करते रहते हैं। इन संगठनों के द्वारा बार-बार भारत को निशाना बनाना पाक प्रयोजित होता है। पाक इन संगठनों को आर्थिक रूप से, तकनीकी रूप से, सैन्य प्रषिक्षणां के द्वारा तथा इन आतंकी षिविरों के लिए अपनी जमीन मुहैया करके हर संभव मदद करता रहता है, ताकि ये भारत में अधिक तीव्रता की घटनाओं को अंजाम दे पाये और भारत विकास मे पिछड़ जाये।
 
भारत में होने वाली आतंकी घटनाओं में पाक की संलिप्तता के साक्ष्य भारत पाक के साथ ही अनेक वैश्विक संगठनों जैसे यूएनओ सुरक्षा परिषद तथा विश्व मानवाधिकार आयोग के समक्ष प्रस्तुत करता रहा है और यह कहता रहा है कि पाक को आतंकवादी देशों की सूची में डाला जाये ताकि भारत मे पाक प्रायोजित आतंकी घटनाओं को रोका जा सके।वैश्विक संगठनों व देशों का पाक को इस सूची मे न डालना अपनी-अपनी कूटनीति व स्वार्थ का हिस्सा है। भारत के द्वारा प्रस्तुत किये गये साक्ष्यां से यहाँ भली-भांति सिद्ध हो चुका है कि पाक, भारत मे होने वाली लगभग प्रत्येक आतंकी घटना मे संलिप्त है। इन आतंकवादी घटनाओं को रोकने के राष्ट्रीय व अर्न्तराष्ट्रीय प्रयासो के साथ ही पाक का 3-4 भागों मे विखण्डित होना एक विकल्प के रूप मे देखा जा सकता है जिससे पाक के इन ठिकानों को चिन्हित करके नष्ट किया जा सके।
 
यदि हम पाक की भौगोलिक स्थिति को देखें तो पाक 3 बडे़ भागों में विखडित हो सकता है जो क्रमश  सिंध, ब्लूचिस्तान तथा खैबर पख्तून के रूप में है। पाकिस्तान का खैबर पख्तून क्षेत्र प्रमुख आतंकी प्रशिक्षण शिविरों तथा आतंकवादियों की शरणस्थली है जो आतंक के निर्माण का ठिकाना है। इन शिविरों में सदस्यों की भर्ती जिहाद व इस्लाम को खतरा दिखाकर की जाती है। इन्हें धार्मिकता का हवाला देकर मनोवैज्ञानिक रूप से इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाता है कि ये स्वयं की जान देने से भी नही हिचकते, हांलाकि खैबर पख्तून पाकिस्तान का ही भाग है फिर भी पाक इसे कबायली क्षेत्र का नाम देकर अपनी प्रषासकीय सीमाओं से पृथक मानता है और कोई कार्यवाही न करने की मजबूरी बताता है।
 
 
पाकिस्तान का अलग-अलग भागों मे विभाजित होने पर कुछ वैश्विक और क्षेत्रीय लाभ देखे जा सकते है;प्रथम, सिंध पाक का प्रमुख व्यवसायी क्षेत्र है तथा कराची इसी के अंतर्गतआता है जो पाक के विकास की रीढ़ है। इसका विखण्डन इसके विकासको ओर भी अधिक बढ़ा देगा,द्वितीय, पाक में 66 प्रतिशत आबादी 30 वर्ष की आयु की है जो बेकारी, गरीबी,भूखमरी, कुपोषण, राजनीतिक अस्थिरता तथा जिहादी आतंकवाद की चपेटमें आने से बच जायेगी,तृतीय, दक्षिण एषिया के विकास व उसकी समृद्धता मे वृद्धि संभव होपायेगी,चतुर्थ, पाक में स्वास्थ्य व षिक्षा के क्षेत्र में विकास के साथ उद्योगों कीस्थिति में अपेक्षित सुधार संभव हो पायेगा तथा कौषल विकास कार्यक्रमोंके माध्यम से रोजगार के अवसरों का सृजन होगा,पंचम, शासन व प्रशासन व्यवस्था में सैन्य हस्तक्षेप कम होगा जिस कारणचुनी हुई सरकार बेहतर नीतियां का निर्माण करके राष्ट्र के सभी वर्गो कासमुचित विकास कर पायेगी,षष्ट्म, आतंकी घटनाओं की रोकथाम के बाद पाक के नागरिक भी आंतरिक रूप से स्वयं को सुरक्षित महसूस करेंगे,सप्तम्, पाक को वैष्विक स्तर पर अपनी साफ-सुथरी छवि बनाने में मदद मिलेगी और उसकी विषवसनीयता बढ़ेगी,अष्ट्म,निष्चित रूप से हम अपने पड़ोसी तो नहीं बदल सकते परंतु उनकी समस्याओं को सुलझा कर स्थिरता तो प्रदान कर सकते हैं, जिससे हम अपने देष को और अधिक सुरक्षित करके विकास के अधिक अवसरों का सृजन कर पाएंगे,नवम्, अफगानिस्तान के समान भारत, पाक की आर्थिक, राजनैतिक, वैश्विक तथा तकनीकी मदद करके उसके विकास में सहयोग प्रदान कर पायेगा और दषम्, भारत-पाक के बीच आपसी विवादों को निपटाने के अवसरों में वृद्धि होगी जो दोनों देषों के संबंध बहाली के लिए आवश्यक है।
 
पाकिस्तान को विभिन्न भागों में विभाजित होने के नुकसान भी होंगे जिन्हें शीघ्रता से हल करना अति आवश्यक होगा। वे हानियाँ अग्रलिखित हैं;विभाजन के पश्चात पाकिस्तान में आंतरिक अस्थिरता उत्पन्न होगी जो उसकी स्थापित व्यवस्था मे आमूल-चूल परिवर्तन लायेगी। इसका भारत पर भी सीधा प्रभाव पडेगा। यह विभाजन आंतकी संगठनों व उनके संरक्षकों को सीधे चोट पहुँचाने वाला होगा फलस्वरूप वह पाक सैन्य ठिकानों पर कब्जा करके न्यूक्लियर हथियारों के साथ बड़ी आतंकी घटनाओं को अंजाम दे सकते है। अन्यथा विष्व को अपनी मांगें मनवाने के लिए मजबूर कर सकते हैं, इनके इस्तेमाल का हवाला देकर।वैश्विक समुदाय दक्षिण एशिया मे अंशाति व अस्थिरता का हवाला देकर पाक में सैनिकों को बसाकर यहाँ अपना प्रभुत्व स्थापित करने की चेष्टा कर सकते हैं। इस विभाजन के पष्चात् षिया व सुन्नी सम्प्रदाय प्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे के विद्रोही हो जाएंगे जिससे धार्मिक टकराव उत्पन्न हो सकता है, जो धार्मिक आधार पर पाक मे ही नहीं वरन् विष्व अषान्ति का बड़ा कारण बन सकता है। चीन इस अवसर का लाभ उठाकर भारत के लिए खतरा उत्पन्न कर सकता है।
 
वर्तमान समय में पाकिस्तान आर्थिक रूप से बेहद कमजोर स्थिति मे है। वैश्विक समुदायों ने आतंक में उसकी संलिप्ता के कारण उससे दूरियां बढा ली हैं तथा पाक का आंतरिक तनाव उसके लिए बड़ा सिरदर्द बन गया है। सैन्य हस्तक्षेप के कारण पाक सरकारें हमेषा से ही मजबूत व कडे निर्णय लेने मे असमर्थ रही हैं, जिस कारण वहाँ कभी भी रोजगार, षिक्षा व स्वास्थ्य के लिए बेहतर रूपरेखा का निर्माण नही हो पाया। उद्योगों के विकास तथा कौषलों मे वृद्धि करके स्वरोजगार के अवसर सृजन में भी पाक पिछड़ा रहा है। इसका मुख्य कारण आतंकी संगठनों को आर्थिक सुविधाएं देना है।जिसका परिणाम हम पाक में धार्मिक व लैंगिक असमानता के रूप में देखते हैं। जो इतने वर्षों के पष्चात् ज्यो की त्यो बनी हुई है। पाकिस्तान की धार्मिक कट्टरता की नीति व उसकी उन्मादी भाषा ने अन्यां से कहीं अधिक स्वयं उसका ही नुकसान किया है।
 
पाकिस्तान आज गरीबी, भूखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी, निम्न स्वास्थ्य दषाओं तथा भ्रष्टाचार जैसी समस्याओ से जूझ रहा है, जो वित्त की कमी के कारण उत्पन्न हो रही है। पाक विष्व से मिलने वाली आर्थिक सहायता का एक बड़ा भाग इन सामाजिक उत्थान के क्षेत्रों मे व्यय न करके आतंकी बनाने में लगाता है जो उसे अंदर ही अंदर खोखला बना रहा है।पाकिस्तान को उसकी इन समस्याओं से निजात के लिए उसका अपेक्षित विखण्डन एक विकल्प के रूप मे दिखता है। जो दक्षिण एषिया महाद्वीप को एक विकसित, समृद्ध व सषक्त क्षेत्र बनने में निष्चित ही सहायक होगा।हजारों वर्षों से भारतीय उपमहाद्वीप हमेशा से ही साधकों की भूमि रहा है। एक ऐसी भूमि जहां बौद्धिकता, विविधता, विचारों की बहुलता का सम्मान और पोषण किया गया है। यही कारण है कि दुनिया का यह हिस्सा संस्कृतियों, धर्मों, जातीयताओं और इतिहास का पिघलने वाला बर्तन है। इस उप महाद्वीप के विभाजन ने हमारे पश्चिमी पड़ोस में रहने वाले लोगों के लिए कई अनदेखी मुद्दे पैदा किए हैं।
 
 
बलूचियों, पश्तूनों, सिंधियों और उस हिस्से के आदिवासियों पर लगातार अत्याचार किए जा रहे हैं और उनके सत्ताधारी कुलीनों के हाथों लगातार शोषण का सामना करना पड़ रहा है। वे विदेशी संस्कृतियों, भाषाओं और परंपराओं के अधीन हैं। यहां तक कि उनकी दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों और समाज में पनपने के उनके अधिकार को गंभीर खतरे में डाल दिया गया है।इस क्रूरता ने उनके देश में विभिन्न अलगाववादी आंदोलनों को जन्म दिया है। संबंधित लोग अपनी पहचान, प्रथाओं और मानदंडों को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनके संकट की इस घड़ी में प्रत्येक भारतीय भाई-बहन का कर्तव्य है कि वे अपनी पहचान के निर्धारण की लड़ाई में नैतिक रूप से अपनी गतिविधियों का समर्थन करें।
 
दूसरा, उक्त पड़ोसी की राज्य अर्थव्यवस्था के बारे में जागरूकता फैलाने का प्रयास किया जाना चाहिए, जिसे भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों की ओर पुनः निर्देशित किया जा रहा है। इसने एक दृश्य तैयार किया है जहाँ हमारे अपने ही भाइयों को बलूचिस्तान, सिंधुदेश और आदिवासी क्षेत्रों में दुख और गरीबी का जीवन जीना पड़ता है। यहां तक कि यह क्षेत्र आतंकवाद का भी केंद्र बन गया है। इन क्षेत्रों को जानबूझकर विकास के दायरे से बाहर रखा गया है ताकि कुलीनों को समृद्ध करने और पूरे दक्षिण एशिया में आतंकवाद का वित्तपोषण किया जा सके। पूरे विश्व और विशेषकर दक्षिण एशिया की शांति और स्थिरता को इसके कारण गंभीर खतरे में डाल दिया गया है।
 
तो आइए हम यह संकल्प लें कि हम भारतीय अपनी सांस्कृतिक और जातीय पहचान के संरक्षण के लिए बलूचियों, पंस्तुनिस, आदिवासियों और सिंधी बंधुओं द्वारा की जा रही माँगों की गंभीरता के बारे में जागरुकता फैलाएंगे, जिन्हें केवल अलगाव और सृजन द्वारा हासिल किया जा सकता है। 
 
                                                                                                                                   
 

लेखक: सन्नी राज

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