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प्रो. विधु रावल

लोकतांत्रिक मूल्य भारतीय स्वभाव में सदियों से निहित

              भारत में लोकतंत्र का पर्व चल रहा है,  दो महीने के इस पर्व में दुनिया का दसवां हिस्सा मताधिकार का प्रयोग करेगा। भारत वो देश है जो पिछले 2000 सालों में 1400 साल विश्व अर्थव्यवस्था के शीर्ष पर रहा । भारत वो देश है जहां 2000 साल पुराना चर्च है। पारसियों का सबसे पुराना सिनेगाग है। भारत वो देश है जो ईरान से भगाए गए पारसियों और रोमनो द्वारा खदेड़े गए यहूदियों के लिए घर बना। भारत वो देश है जहां निर्वासित तिब्बतियों और दलाई लामा को ठिकाना मिला। भारत वो देश है जहां हिन्दू, जैन, सिक्ख और बौद्ध धर्म जन्मे और फले फूले। भारत वो देश है जहां मुस्लिमों के सभी सेक्ट और उनकी दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी आबादी रहती है। 

 
        यह उस पुराने भारत का जिक्र है जिसकी सोच, आस्थाओं, मान्यताओं, प्रतीकों और प्रतिमानों को दुनिया में घटिया सिद्ध करने की सुपारी देश के ही तथाकथित बुद्धिजीवियों ने ले रखी है। स्थिति तो यह आ गई है कि एक विदेशी पत्रिका में भारत के चिरप्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के एक पत्रकार द्वारा भारत की आलोचना को आधार बनाकर कुछ उलटमार्गी भारतीय समाज के लोकतांत्रिक मूल्यों का विश्लेषण कर रहे हैं। मैकॉले की शिक्षा पदति के भारतीय अनुयायी भारत को आज भी विदेशी नज़र से देखतें है। तभी तो उन्हें पश्चिमी मीडिया अधिक प्रमाणिक लगती है।
 
यह अवधारणा सत्य से परे है कि भारत ने 26 जनवरी 1949 को लोकतांत्रिक मूल्य अपनाए। लोकतंत्र और सहिष्णुता तो भारत की तासीर और स्वभाव में बसी हुई है। विविध मत, आस्था और तर्क का सम्मान भारतवासी सदियों से करते आए हैं। योग्यता के आधार पर नेतृत्व चुनने की परम्परा भारत में तब से है जब पश्चिमी जगत सभ्यता का अर्थ भी नही जानता था। भारत में लोकतंत्र तक से है जब पश्चिमी समाज कच्चा मास खाकर अपनी भूख मिटा रहा था। भारत के लोकतंत्र पर सवाल उठाने वाले यदि भारतीय इतिहास और परम्परा का थोड़ा सा अध्ययन कर लें तो शायद वह अज्ञानता और दुष्प्रचार के अंधकार से खुद को मुक्त कर पाएंगे।
 
भारतीय समाज सदियों से पथप्रदर्शक बनकर दुनियां का मार्गदर्शन करता आया है। बेशक बीच के कुछ कालखंड में ज्ञान के दिव्य प्रकाश षड्यंत्रपूर्वक छुपाया गया लेकिन अंधकार की सभी बेड़ियां तोड़कर भारत फिर से विश्वगुरु बनकर विश्वकल्याण करने की ओर अग्रसर है।

लेखक: प्रो. विधु रावल
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